Monday, October 11, 2010

गुमशुदा प्रेम

साधारण को एक बार पिफर सूचित किया जाता है कि हमारे मुहल्ले का पिछले कई महीनों से गुम हुआ प्रेम अभी भी गुम है। इस बारे में कई बार देश के प्रमुख समाचार पत्रों के माध्यम से इश्तहार भी दे चुका हूं। पर आज तक न तो सूचना पढ़कर प्रेम ही वापस आया और न ही किसी ने उसके बारे में कोई जानकारी दी। पुलिस स्टेशन रपट
लिखवाने जितनी बार भी गया उतनी बार अपना ही कुछ न कुछ गुम हुआ पाया। लिहाजा पुलिस स्टेशन के चक्कर लगाना अब मैंने छोड़ दिया है। हे प्रेम! अब मुहल्ले वाले तुम्हारे बिना बहुत बेचैन है, सच्ची को। जबसे तुम बिन बताए मुहल्ला छोड़ गये हो, मुहल्ले में रंजिश का दौर शुरू हो गया है। मुहल्ले वाले रात को सोये-सोये भी चैन से सो नहीं पा रहे हैं। सुबह उठते ही बिना कारण लड़ना शुरू कर देते हैं, लड़ते-लड़ते जब थक जाते हैं तो सोचते हैं कि लड़
किस लिये रहे थे? हे प्रेम! तुम्हारे बिना मुहल्ले का हर जीव बीमार है। वह सरकारी अस्पताल के चक्कर लगा-लगाकर टूट गया है। अस्पताल में डाक्टर मिले तो उसकी बीमारी पकड़ में आये। हर मुहल्ले वाले को नपफरत की बीमारी गले से लगाये अब तुम्हारी बहुत याद आ रही है। तुम जहां भी हो, जैसे भी हो, यह सूचना पढ़ते एक दम लौट आओ प्लीज। सुनो प्रेम! इस मुहल्ले से एक-एक कर ईमानदारी, मानवीयता, सौहार्द तो पहले ही गुम हो चुके थे। तुम थे तो किसी ने उन्हें ढूंढने की कोशिश भी नहीं की। मैंने भी नहीं की। मैं एक दिन उन्हें ढूंढने चला भी था कि बगल वाले पड़ोसी ने यह कहकर रोक दिय ईमानदारी, मानवीयता, सौहार्द को पिफर यहां लाकर क्यों मुहल्ले वालों के पैरों पर कुल्हाड़ी मारना चाहते हो यार? मुहल्ले में पहले ही नाजायज कब्जों से कुत्तों को भी शौच करने तक के लिए जगह नहीं मिल रही, इनको वापस लाकर क्या अपने घर में रखोगे?’ बात में वजन था, सो जच गई। सच्ची को, अगर मैं उनको ढूंढकर ले आता तो अपने घर में रखता कहां? एक कमरा, जने पांच। उफपर से रिश्तेदारों का आना जाना। पड़ोसियों के घर उन्हें कितना भेजा जाये? बरतन का मुंह अगर खुला हो तो कुत्ते को तो शरम होनी चाहिएं पर अभी तक मैं इस स्टेज का बंदा नहीं हुआ हूं। हे प्रेम! जबसे मुहल्ले से ईमानदारी गई मुहल्लेवासियों ने अपने कपड़े पहनने छोड़ औरों के बाहर सूखने पड़े कपड़े उठा शान से पहनने शुरू कर दिये। तब तुम थे तो कोई अपने कपड़े मांगता तो दूसरा उन्हें चूपचाप पर अब बाहर कोई राख भी नहीं रखता।
मुहल्ले से संवेदना के जाने के बाद भी मुहल्ला जैसे तैसे जी रहा था। मरते हुए ही सही, तुम जो मुहल्ले में कम से कम थे। मानवीय मूल्यों के जाने के बाद भी मुहल्ले में जीवन जैसे कैसे कट रहा था, नंग-धडंग होकर ही सहीं कम से कम तुम तो मुहल्ले में थे। सच कहूं, तुम्हारे जाने के बाद मुहल्ले के हाल खस्ता हो गये हैं। कुत्ते का कुत्ता बैरी तो यहां तुम्हारे समय से था, अब आदमी भी आदमी का बैरी हो गया है। तुम्हारे बिना पता ही नहीं चलता कि आदमी कौन है और कुत्ता कौन? हे प्रेम! जिस दिन तुम भी औरों की तरह मुहल्ला छोड़कर गुम हो गये थे, मैंने भी कुछ देर औरों की तरह खुशी की सांस ली थी। पर सबसे ज्यादा श्याम लाल खुश हुआ था, तुम्हारे एकदम साथ वाला। वह इसलिये खुश था कि अब तुम्हारी खोली उसकी जो होनी थी। उसका यह अधिकार भी बनता था। पहले की तरह तुम्हें भी ढंूढने का ड्रामा हुआ। सभी एक से बढ़कर एक कलाकार बने। पर तुम नहीं मिले। मिलते भी कहां? मिलते तो तब न जो मिलने के लिए गुम हुए होते। और तो और, मुहल्ले के तीन- चार बुजुर्गों ने भी यह कहकर प्रेम तुम्हारी ढूंढ रुकवा दी कि बेकार में क्यों परेशान हुए पड़े हो, ढूंढना ही है तो रोटी ढूंढो, प्रेम को ढूंढकर पेट तो नहीं भरने का। रोटी से पफुर्सत मिले तो प्रेम के बारे में सोचो। बात में सबको दम दिखा और रोटी को ढूंढने की दौड़ में दौड़ पड़े। पर प्रेम! सच कहूं। तुम्हारे गुम होने के बाद मुहल्ले में प्रेम जहां था, वहीं रुक गया है। जितना था इन महीनों में उससे एक इंच भी आगे नहीं सरक पाया है। और तो और, मेरे और पत्नी के बीच के प्रेम को भी पफंगस लगने लगी है।
प्रेमिका का प्रेम तो छोड़ यार। तुम्हारे गुम होने के बाद से अब बुढ़उफ चौपाल पर बैठे सारा दिन बीते हुए दिनों के प्रेम को याद न कर बीते दिनों की नपफरत को याद कर बल्लियां उछलते रहते हैं। और हां, कल्लो और सतुआ का प्रेम जो तुम्हारे रहते अंकुरित हुआ था और तब मुहल्ले वालों ने उसे चार कोस से पानी लाकर सींचना शुरू किया था तुम्हारे जाने के बाद से रत्ती भर भी नहीं बढ़ा है। अब तो कलुआ और सतुआ ने भी उसे पानी देना छोड़ दिया है। अब आगे क्या कहूं प्रेम! मत पूछ, तुम्हारे बिना मुहल्ले का क्या हाल है? हे प्रेम! अगर तुम्हारे दिल में मुहल्ले वालों के प्रति रंच भर भी संवेदना है तो अब सारे शिकवे भुला एकदम लौट आओ। तुम्हाने जाने के बाद श्याम लाल ने तुम्हारी खोली तोड़ जो पान की दुकान बनाई थी, वह मैंने तुड़ा दी है। सर्व साधारण से भी एक निवेदन। हमारे प्रेम का जिस किसी को भी पता चले वह कृपया कम से कम मुझे सूचित अवश्य करे। सूचित करने वाले को मुंह मांगा ईनाम दिया जायेगा। हमारे प्रेम का कद लम्बा, बदन गठा हुआ, होठों पर न खत्म होने वाली मुस्कान, चेहरे पर मस्ती, आंखों में नशा, सभी को बांहों में भरने का उल्लास रहता है। उसने बासंती रंग के कपड़े पहन रखे हैं।



14 comments:

  1. ब्लॉग दुनिया में आपका स्वागत है गौतम जी।
    पहला ही व्यंग्य बड़ा जोरदार लगाया है। बधाई।
    कुछ और एग्रीगेटर लगा लें लिंक आपके मेल पर भेज रहाह हूँ।

    प्रमोद ताम्बट
    भोपाल
    www.vyangya.blog.co.in
    http://vyangyalok.blogspot.com
    व्यंग्य और व्यंग्यलोक
    On Facebook

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  2. bilkul anokha andaaj hai aapka. ..aabhar.

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  3. हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है.

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  4. आपका लेख अच्छा लगा।धन्यवाद!

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  5. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपने बहुमूल्य विचार व्यक्त करने का कष्ट करें

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  6. ज़बर्दस्त व्यंग्य्।

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  7. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

    कृपया अपने ब्लॉग पर से वर्ड वैरिफ़िकेशन हटा देवे इससे टिप्पणी करने में दिक्कत और परेशानी होती है।

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  8. आपका लेख अच्छा लगा।धन्यवाद!

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  9. व्यंग बहुत ही जबरदस्त .. आपका स्वागत है ब्लॉग की दुनिया में.. बधाई स्वीकार करें..मेरा ब्लॉग - http://amritras.blogspot.com

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  10. घर से निकलो तो ज़माने से छुपा कर निकलो ,
    आहट हो ना ज़रा भी पावँ दबा कर निकलो.

    लौट आयें ये खुदा फिर से वापस घर में
    कही चलने से पहले अब ये दुआ कर निकलो .

    राहें मकतल बनी हैं , तू बेकफ़न न रह जाए
    इसलिए हाथ पे पता घर का लिखा कर निकलो .

    अपने ही खून के हाथों में हैं खंज़र इसलिए
    रोएगा कौन तुझ पे ,खुद को रूला कर निकलो .

    ये दौर खून का हैं हवाओं में बह रहे नश्तर
    घर के हर शख्स को सीने से लगा कर निकलो

    कवि दीपक शर्मा

    http://www.kavideepaksharma.com

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  11. इस नए सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  12. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई
    ब्लाग जगत में आपका स्वागत है
    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    भिलाई में मिले ब्लागर

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